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Baisakhi: भारतीय संस्कृति और परंपराओं की धरोहर बनाये रखने में बैसाखी का एक महत्वपूर्ण स्थान है। आमतौर पर बैसाखी या वैशाखी पंजाबी घरों में मानाई जाती है। लेकिन बैसाखी का त्योहार अनेक धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ जुड़ा हुआ है। यह त्योहार हर साल अप्रैल या मई महीने में मनाया जाता है।

बैसाखी को कई तरीके से मनाया जा सकता है। लेकिन आमतौर पर बैसाखी के दिन लोग गुरुद्वारों में जाकर अपनी प्रार्थना करते हैं। साथ ही, धार्मिक समारोहों में भाग लेते हैं। यहां लोग गुरु ग्रंथ साहिब की आरती करते हैं और कीर्तन गाते हैं। इसके अलावा, बैसाखी के अवसर पर मेले आयोजित किए जाते हैं, जहां लोग कई तरह की खास व्यंजनों का आनंद लेते हैं। खेल-कूद का मजा लेते हैं। इतना ही नहीं, लोग बांसुरी, ढोल, और नाच-गाने के साथ उत्सव मनाते हैं।

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खालसा पंथ की स्थापना

इतिहास की माने तो बैसाखी का काफी महत्व है। आपको बता दें कि साल 1699 में, सिख समुदाय के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। इस दिन को सिखों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन लोग धार्मिक समारोहों और आराधना करते हैं, जो उनके धार्मिक आदर्शों को दर्शाता है। साथ ही, बैसाखी का त्योहार भारतीय खेती की बुआई और रबी फसलों की कटाई को भी दर्शाता है। ये त्योहार धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संभाले हुए है।

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बौद्ध धर्म में भी मान्यता

ऐसा माना जाता है कि इस दिन गौतम बुद्ध को ज्ञान या निर्वाण प्राप्त हुआ था। बैसाखी को मेष संक्रांति के रूप में भी जाना जाता है और यह सौर कैलेंडर की शुरुआत का प्रतीक है क्योंकि इस दिन, सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, जो बारह राशियों में से पहली राशि है। बैसाखी पर या उसके आसपास पड़ने वाले अन्य वसंत त्योहार हैं ओडिशा में पना संक्रांति, पश्चिम बंगाल में पोइला बैसाख, असम में रोंगाली बिहू, तमिलनाडु में पुथंडु, बिहार में वैशाखी और केरल में पूरम विशु। वे सभी थोड़ी भिन्न परंपराओं के साथ फसल के मौसम की शुरुआत का जश्न मनाते हैं।

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