Bareilly : 24 साल जेल में रहने के बाद बेगुनाह को मिली आज़ादी, हाई कोर्ट से बरी होने के एक महीने बाद खुले जेल के दरवाज़े बरेली सेंट्रल जेल से रिहा हुए आज़ाद खान, सिस्टम की बड़ी लापरवाही सामने आई।
बुधवार शाम ठीक 7 बजकर 15 मिनट पर जब बरेली सेंट्रल जेल का भारी-भरकम लोहे का गेट खुला, तो 54 वर्षीय आज़ाद खान धीरे-धीरे बाहर निकले। यह पल उनके लिए सिर्फ़ रिहाई नहीं, बल्कि 24 साल, 8 महीने और 26 दिन लंबी कैद के बाद मिली पहली आज़ादी की सांस थी।
हैरानी की बात यह रही कि इलाहाबाद हाई कोर्ट से पूरी तरह बरी होने के बावजूद आज़ाद खान को एक महीना और जेल में रहना पड़ा। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा था कि प्रॉसिक्यूशन आज़ाद खान को अपराध से जोड़ने वाला एक भी गवाह पेश नहीं कर सका।
TOI की रिपोर्ट के बाद हरकत में आया जेल प्रशासन
आज़ाद खान की रिहाई टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) की रिपोर्ट के बाद संभव हो सकी, जिसमें बरी होने के बावजूद उनकी जेल में कैद को उजागर किया गया था। खबर सामने आते ही लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश जेल मुख्यालय ने बरेली जेल प्रशासन को तुरंत कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद मैनपुरी जिला अदालत से समन्वय कर रिहाई के आदेश हासिल किए गए। यह मामला वर्षों से चली आ रही उस प्रक्रियात्मक सुस्ती को उजागर करता है, जिसकी वजह से एक बेगुनाह को आज़ादी मिलने में महीनों की देरी हो गई
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चुपचाप मिली आज़ादी, ना जश्न ना शोर
आज़ाद खान की रिहाई किसी उत्सव की तरह नहीं, बल्कि बेहद शांत और संवेदनशील माहौल में हुई। जेल अधिकारियों के मुताबिक, लंबे समय तक जेल में रहने, कानूनी अनिश्चितता और अकेलेपन ने आज़ाद को शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर कर दिया था। इसी कारण रिहाई के दौरान विशेष सावधानी बरती गई।
2001 में खुद कोर्ट पहुंचे थे आज़ाद
आज़ाद खान ने बताया कि वर्ष 2001 में जब उन्हें पता चला कि उनके खिलाफ डकैती का मामला दर्ज हुआ है, तो वह स्वेच्छा से अदालत में पेश हुए थे। इसके बाद जो हुआ, उसने उनकी पूरी ज़िंदगी बदल दी। जवानी सलाखों के पीछे गुजर गई और अधेड़ उम्र में जाकर आज़ादी नसीब हुई।
भाई को बुलाकर सौंपी गई जिम्मेदारी
जेल प्रशासन ने आज़ाद की नाजुक मानसिक स्थिति को देखते हुए उन्हें अकेले छोड़ना उचित नहीं समझा। उनके बड़े भाई मस्तान खान को बरेली बुलाया गया, ताकि रिहाई के बाद आज़ाद को सुरक्षित परिवार तक पहुंचाया जा सके। मस्तान खान के बुधवार रात 11 बजे तक बरेली पहुंचने की उम्मीद जताई गई थी।
सिस्टम की खामियों पर उठे सवाल
इस मामले में अदालत द्वारा नियुक्त वकील यानेंद्र पांडे ने कहा कि यह घटना न्यायिक और जेल व्यवस्था के बीच तालमेल की गंभीर कमी को उजागर करती है। उन्होंने कहा कि जब तक मीडिया और बाहरी हस्तक्षेप नहीं हुआ, तब तक कोई भी विभाग सक्रिय नहीं हुआ। जेल मुख्यालय से लेकर जिला अदालत तक सभी एजेंसियों ने बाद में मिलकर दस्तावेज़, पर्सनल बॉन्ड और अन्य औपचारिकताओं को पूरा किया।
अब असली चुनौती: नई दुनिया में लौटना
शाम ढलते वक्त आज़ाद खान जेल परिसर में चुपचाप बैठे थे। कानूनी तौर पर वह आज़ाद हो चुके थे, लेकिन असल संघर्ष अब शुरू होना था।
एक ऐसा व्यक्ति जो जवानी में जेल गया और अधेड़ उम्र में बाहर आया-उसके लिए आज़ादी सिर्फ़ जेल से बाहर निकलना नहीं, बल्कि उस दुनिया में दोबारा जीना सीखना है जो उसके बिना आगे बढ़ चुकी है।
