Speedy Trial: भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था आज गंभीर संकट से गुजर रही है। देश की अदालतों में करोड़ों मुकदमे वर्षों से लंबित हैं। ऐसे में संविधान द्वारा दिया गया त्वरित न्याय का अधिकार आम नागरिक के लिए धीरे-धीरे एक दूर का सपना बनता जा रहा है। “न्याय में देरी, न्याय से वंचित होना है” अब केवल कहावत नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुकी है। हजारों विचाराधीन कैदी बिना दोष सिद्ध हुए वर्षों तक जेलों में बंद हैं, जबकि उनके मामले अदालतों में तारीख पर तारीख झेल रहे हैं।
संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार स्पष्ट किया है कि त्वरित सुनवाई इसी मौलिक अधिकार का हिस्सा है। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि अदालतों पर अत्यधिक बोझ, न्यायाधीशों की कमी और प्रक्रियागत ढिलाई इस अधिकार को कमजोर कर रही है। हरियाणा के ग्रामीण इलाकों से आने वाले लोग, विशेषकर हिसार जैसे जिलों में, वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
त्वरित न्याय के अधिकार को पहली बार 1979 के ऐतिहासिक मामले हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य में मजबूती से स्वीकार किया गया। इस मामले में यह सामने आया कि कई विचाराधीन कैदी ऐसे थे, जो अपराध की अधिकतम सजा से भी अधिक समय तक जेल में बंद रह चुके थे। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन माना और कहा कि त्वरित न्याय कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है।
इसके बाद ए. आर. अंतुले बनाम आर. एस. नायक (1992) के फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि त्वरित न्याय का अधिकार केवल मुकदमे तक सीमित नहीं है, बल्कि जांच, सुनवाई और अपील—पूरी न्याय प्रक्रिया पर लागू होता है। अदालत ने यह भी बताया कि अत्यधिक देरी की स्थिति में जमानत देना या कार्यवाही समाप्त करना उचित उपाय हो सकता है।
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हाल के वर्षों में भी सर्वोच्च न्यायालय ने इस सिद्धांत को दोहराया है। उमर खालिद मामले में न्यायालय ने कहा कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद”। केवल मुकदमे की लंबितता के आधार पर किसी को लंबे समय तक जेल में रखना, सजा दिए बिना दंड देने जैसा है, जो अनुच्छेद 21 के मूल भाव के विरुद्ध है।
आज भारत की अदालतों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। इनमें से लगभग 44 प्रतिशत आपराधिक मामले हैं। राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के अनुसार, देश की जेलों में बंद लोगों में से लगभग 75 प्रतिशत विचाराधीन कैदी हैं, जिनका अभी दोष सिद्ध नहीं हुआ है। यह स्थिति हरियाणा के जिला न्यायालयों, विशेषकर हिसार में भी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
उच्च न्यायालयों में एक मुकदमे के निपटारे में औसतन 10 वर्ष, जबकि निचली अदालतों में लगभग 5 वर्ष का समय लग जाता है। कई राज्यों में बड़ी संख्या में आपराधिक मामले दस वर्ष से भी अधिक समय से लंबित हैं। इसके पीछे कई कारण हैं—न्यायाधीशों के हजारों पद खाली हैं, पुलिस समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं करती, एफआईआर दर्ज करने में देरी होती है और गवाह डर, दबाव या असुविधा के कारण अदालत में उपस्थित नहीं होते।
बार-बार की तारीखें इस समस्या को और गंभीर बनाती हैं। एक औसत आपराधिक मामले में 7 से 10 बार स्थगन लिया जाता है। जबकि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 309 दिन-प्रतिदिन सुनवाई का निर्देश देती है, लेकिन व्यवहार में इसका पालन कम ही होता है।
संविधान में त्वरित न्याय का अधिकार तो है, लेकिन इसके लिए कोई अलग और सख्त त्वरित न्याय कानून नहीं है, जो जांच, चार्जशीट, आरोप निर्धारण और फैसले के लिए निश्चित समय सीमा तय करे। कड़े कानूनों जैसे यूएपीए और पीएमएलए में जमानत के प्रावधान इतने कठोर हैं कि कई बार वर्षों तक मुकदमा चले बिना ही व्यक्ति जेल में रहता है, भले ही अंततः वह निर्दोष साबित हो जाए।
न्यायालयों ने तकनीक के उपयोग, ई-कोर्ट, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और ऑनलाइन केस मॉनिटरिंग जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में इनका प्रभाव अभी सीमित है। फास्ट-ट्रैक कोर्ट, लोक अदालतें और ग्राम न्यायालय जैसी योजनाएँ भी अपेक्षित स्तर पर सफल नहीं हो पाई हैं।
इस देरी का सबसे बड़ा असर आम नागरिकों पर पड़ता है। गरीब और कमजोर वर्ग के लोग वर्षों तक मुकदमे लड़ते रहते हैं, परिवार आर्थिक संकट में फँस जाता है, बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है और सामाजिक बदनामी अलग से झेलनी पड़ती है। महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में यह पीड़ा और भी गहरी होती है।
समस्या के समाधान के लिए ठोस और बहुआयामी प्रयास आवश्यक हैं। न्यायाधीशों के खाली पद शीघ्र भरे जाएँ, एक प्रभावी त्वरित न्याय कानून बनाया जाए, जिला स्तर पर तकनीकी संसाधन मजबूत किए जाएँ और छोटे मामलों के लिए वैकल्पिक विवाद निवारण तंत्र को बढ़ावा दिया जाए। साथ ही, मुफ्त कानूनी सहायता व्यवस्था को भी सशक्त बनाना होगा।
अंततः, त्वरित न्याय केवल एक कानूनी सिद्धांत नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मजबूती का पैमाना है। जब न्याय पाने में वर्षों लग जाते हैं, तो संविधान में लिखे अधिकार अर्थहीन प्रतीत होने लगते हैं। जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक सुधार और न्यायिक जवाबदेही एक साथ नहीं आएँगे, तब तक त्वरित न्याय एक सपना ही बना रहेगा—खासकर हिसार जैसे जिलों में, जहाँ आम आदमी आज भी न्याय की बाट जोह रहा है।
— एडवोकेट अनुराधा शर्मा, जिला न्यायालय, हिसार
